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Economic Survey 2020: भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का रोडमैप, प्रो-बिजनेस पॉलिसी पर जोर

Economic Survey 2020:  आर्थिक सर्वेक्षण में प्रो-बिजनेस पॉलिसी पर जोर देने और प्रो-क्रोनी पॉलिसी से बचने की बात कही गई है.

Updated: Jan 31, 2020 3:16 PM
Economic survey pitches china formula for $5 trillion Indian Economy says to Promote Pro-Business Policy and abolish Pro-Crony Policiesआर्थिक सर्वेक्षण में प्रो-बिजनेस पॉलिसी पर जोर देने और प्रो-क्रोनी पॉलिसी से बचने की बात कही गई है.

Economic Survey 2020: आर्थिक समीक्षा 2019-20 में भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए एक रोडमैप दिया गया है. समीक्षा के अनुसार भारत की 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का दारोमदार व्यापार अनुकूल नीतियों को बढ़ावा देने पर आधारित है. यानी सरकार को ऐसी नीतियों पर जोर देना होगा जोर कारोबार को प्रमोट करने वाली हों. इस तरह की नीतियां वेल्थ क्रिएशन के लिए प्रतिस्पर्धी बाजारों की पावर का इस्तेमाल करता है और दूसरी तरफ प्रो क्रोनी नीतियों को समाप्त करता है. इसमें केवल कुछ खास बड़ी कंपनियों या कारोबारियों को ही फायदा होता है. दरअसल, चीन ने भी अपने मैन्युफैक्चरिंग बेस को रफ्तार देने के लिए प्रो-बिजनेस पॉलिसी यानी बिजनेस को बढ़ावा देने वाली ​नीतियों पर जोर दिया था.

प्रो-क्रोनी पॉलिसी से अर्थव्यवस्था को नुकसान

आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 में बताया गया है कि कारोबार समर्थक नीतियों (Pro-Business Policy) के विपरीत, प्रो-क्रोनी ​नीतियों से अर्थव्यवस्था में वेल्थ डिप्रिसिएशन होता है. प्रो-क्रोनी ​नीतियों के कारण इससे जुड़े कारोबारों, फर्जी कारोबारों को फायदा हो सकता है. प्रतिस्पर्धी बाजारों में अच्छी ग्रोथ के बावजूद इन नीतियों ने अर्थव्यवस्था में वैल्यू घटती है.

उदाहरण के लिए, साल 2007 से 2010 तक संबंधित कंपनियों के एक इक्विटी इंडेक्स ने 7 फीसदी का लाभ उठाया तो निश्चित रूप से आदमी के खर्च पर कंपनियों को अच्छा मुनाफा हुआ है. इसके विपरीत, 2011 से इंडेक्स में 7.5 फीसदी की गिरावट हुई, इससे कंपनियों की वैल्यू डिस्ट्रक्शन और कारोबारी अकुशलता जाहिर होती है. सर्वे में कहा गया है कि एक कमिटी की ओर से प्राकृतिक संशोधना का भेदभाव पूर्ण आवंटन से किराये कमाने का मौका मिला और कंपनियों का फोकस प्रोडक्टिव इकोनॉमिक एक्टिविटी को आगे बढ़ाने की बजाय इससे लाभ कमाने पर हो गया.

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प्राकृतिक संसाधनों के भेदभाव पूर्ण आवंटन में 2011 तक प्रो-क्रोनी पॉलिसी का साफतौर पर पता चलता है. इससे लाभार्थियों द्वारा किराया वसूली का रास्ता बना, जबकि 2014 के बाद इन्हीं संसाधनों के प्रतिस्पर्धी आवंटन से इस प्रकार की किराया वसूली का अंत हो गया है. संसाधनों का बाजार आधारित आवंटन से आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है और अधिक वेल्थ क्रिएशन होता है.

क्रोनी फंडिंग से बढ़े विलफुल डिफॉल्ट

इसी तरह, क्रोनी लेंडिंग पॉलिसी से विलफुल डिफॉल्ट के मामले तेजी से बढ़े. क्रोनी लेंडिंग से कंपनियों ने बैंकों से फंड प्राप्त किया, जिससे काफी नुकसान हुआ और ग्रामीण विकास के लिए दी जानी वाले सब्सिडी कम पड़ गईं. जानबूझकर गलत हाथों में जाने वाले प्रत्येक रुपये से वेल्थ खत्म हुआ. विलफुल डिफॉल्टर्स ने 2018 तक, बैंकों को करीब 1.4 लाख करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाया. यदि ये पैसा अर्थव्यवस्था में रहता तो इससे स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक संरक्षण के लिए दोगुना पैसा उपलब्ध रहता, ग्रामीण विकास के लिए दोगुना आवंटन हो पाता अथवा मनरेगा के लिए तीन गुना फंड उपलब्ध रहता.

सर्वेक्षण के अनुसार, आर्थिक सुधार के बाद व्यापक बदलाव के प्रयासों (क्रियेटिव-डिस्ट्रिक्शनः पुरानी व्यवस्था की जगह पर नई व्यवस्था) में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है. 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था में उदारीकरण की शुरुआत हुई. इससे प्रतिस्पर्धी बाजार खुले और व्यापक बदलाव करने वाली शक्तियों को लाभ कमाने का अवसर मिला जिसे हम आज भी देखते हैं. बाजार में इनोवेशन के आने से लोगों को पुरानी तकनीकों की तुलना में बेहतर सेवाएं मिलती हैं. इससे बाजारों में नई कम्पनियों का उदय होता है जो वर्तमान कम्पनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करती है और उपभोगताओं के लिए कीमतों में कमी लाती हैं.

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