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Economic Survey 2020-21 Highlights: लॉकडाउन से आजीविका बची, स्वास्थ्य में निवेश बढ़े, जानें आर्थिक सर्वे की मुख्य बातें

Economic Survey Highlights 2020-21: आइए आर्थिक सर्वेक्षण 2020-21 की मुख्य बातों के बारे में जानते हैं.

Updated: Jan 29, 2021 6:10 PM
Economic Survey 2020-21 Highlights lockdown saved lives and livelihood know main points of surveyआइए आर्थिक सर्वेक्षण 2020-21 की मुख्य बातों के बारे में जानते हैं.

Economic Survey 2021 Highlights in Hindi: मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) केवी सुब्रमण्यन ने शुक्रवार को आर्थिक सर्वेक्षण 2020-21 को लॉन्च किया, जिसे सुबह संसद में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पेश किया. सीईए ने आर्थिक सर्वेक्षण का मोबाइल ऐप लॉन्च किया. प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुब्रमण्यन ने कहा कि आर्थिक सर्वेक्षण के पहला अध्याय कोविड-19 संकट में जीवन और आजीविका को बचाने के लिए भारत की नीतियों के बारे में है. सर्वेक्षण में वित्त वर्ष 2021-22 के लिए आर्थिक विकास दर (GDP) 11 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया है. आइए आर्थिक सर्वेक्षण 2020-21 की मुख्य बातों के बारे में जानते हैं.

शताब्दियों में होने वाले संकट के दौरान जीवन और आजीविका की सुरक्षा

कोविड-19 महामारी की शुरुआत के बाद भारत ने जीवन और आजीविका की सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित किया.
यह प्रयास उस मानवीय सिद्धांत पर आधारित है, जिसके तहत लोगों की जिंदगी वापस नहीं लाई जा सकती है.
महामारी के कारण जीडीपी में कमी आई. जीडीपी में रिकवरी संभावित है.
शुरुआत में ही कड़े लॉकडाउन के कारण लोगों के जीवन की रक्षा करने और आजीविका सुरक्षित करने में मदद मिली. मध्य और लम्बी अवधि में आर्थिक रिकवरी में मदद होगी.
भारत की रणनीति ने ग्राफ को फ्लैटन किया और पीक को सितंबर 2020 तक टाल दिया.
पहली तिमाही में जीडीपी में 23.9 फीसदी की कमी, जबकि दूसरी तिमाही में जीडीपी में 7.5 फीसदी की कमी आई है. यह वी-शेप रिकवरी को दिखाता है.
कोविड महामारी ने मांग और आपूर्ति दोनों को प्रभावित किया है.
भारत एक मात्र देश था जिसने आपूर्ति बढ़ाने के लिए संरचनात्मक सुधार घोषित किए ताकि उत्पादन क्षमताओं का कम से कम नुकसान हो.
आर्थिक गतिविधियों पर लगी रोक को हटाने के साथ मांग बढ़ाने को लेकर नीतियां बनाई गईं.
महामारी संक्रमण के दूसरे दौर को रोकने में सफलता, अर्थव्यवस्था में तेजी आई.

2020-21 में अर्थव्यव्सथा की स्थिति

कोविड-19 महामारी के कारण पूरे विश्व को आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ा. यह वैश्विक वित्तीय संकट से भी अधिक गंभीर रहा.
आकलन के मुताबिक वैश्विक आर्थिक उत्पादन में 2020 में 3.5 फीसदी की कमी दर्ज की जाएगी.
पूरी दुनिया में सरकारों और केंद्रीय बैंकों ने विभिन्न नीतियों के माध्यम से अर्थव्यवस्थाओं को समर्थन दिया.
भारत ने चार आयामों वाली रणनीति को अपनाया-महामारी पर नियंत्रण, वित्तीय नीति और लंबी अवधि के संरचनात्मक सुधार.
वित्तीय और मौद्रिक समर्थन दिया गया. लॉकडाउन के दौरान कमजोर वर्ग को राहत दी गई. अनलॉक के दौरान खपत और निवेश को प्रोत्साहन दिया गया.
मौद्रिक नीति ने नकदी की उपलब्धता सुनिश्चित की. कर्ज लेने वालों को राहत दी गई.
एनएसओ के एडवांस एस्टिमेट के अनुसार भारत की जीडीपी की विकास दर वित्त वर्ष 2021 (-) 7.7 फीसदी रहेगी. वित्त वर्ष 2021 की पहली छमाही की तुलना में दूसरी छमाही में 23.9 प्रतिशत की वृद्धि होगी.
वित्त वर्ष 2021-22 में भारत की वास्तविक जीडीपी की विकास दर 11.0 फीसदी रहेगी और सांकेतिक जीडीपी की विकास दर 15.4 फीसदी रहेगी, जो स्वतंत्रता मिलने के बाद की सबसे ज्यादा होगी.
कोविड-19 वैक्सीन की शुरुआत के बाद से आर्थिक गतिविधियां और भी सामान्य हुई हैं.
वी (V) आकार में सुधार जारी है, जैसा कि बिजली की मांग, इस्पात की खपत ई-वे बिल, जीएसटी संग्रह आदि तेज उतार-चढ़ाव वाले संकेतकों में निरंतर बढ़ोतरी के रूप में दिखा है.
टीकाकरण अभियान की शुरुआत के साथ अर्थव्यवस्था सामान्य स्थिति की ओर लौट रही है.
सेवा क्षेत्र, खपत और निवेश में मजबूती के साथ सुधार की उम्मीद बढ़ी है.

क्या विकास से कर्ज स्थायी रखने में मदद मिलती है?

भारतीय संदर्भ में विकास से कर्ज स्थायी रखने को बढ़ावा मिलता है, लेकिन इससे विकास को गति मिलना जरूरी नहीं है.
कर्ज स्थायी रहना ब्याज दर और विकास दर के बीच के अंतर पर निर्भर करता है.
भारत में कर्ज पर ब्याज दर, विकास दर से कम है- यह नियम है, लेकिन अपवाद अलग हैं.
विकास के चलते ऊंची विकास दर वाले देशों में कर्ज स्थायी हो जाता है.
सक्रिय राजकोषीय नीति से सुनिश्चित हो सकता है कि उत्पादन क्षमता को होने वाले संभावित नुकसान को सीमित करके सुधारों का पूरा लाभ मिले.
विकास को गति देने वाली राजकोषीय नीति से जीडीपी की कर्ज के अनुपात में कमी को बढ़ावा मिलने की संभावना है.

क्या भारत की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग से उसके आधारभूत तत्वों का पता चलता है? नहीं!

दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था को सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग में कभी भी सबसे कम निवेश ग्रेड (बीबीबी-/बीएए3) नहीं दिया गया है.
दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था को मुख्य रूप से एएए रेटिंग दी गई है.
चीन और भारत ही सिर्फ इस नियम में अपवाद हैं- चीन को 2005 में ए-/ए2 रेटिंग दी गई थी और अब भारत को बीबीबी-/बीएए3 रेटिंग दी गई है.
भारत की क्रेडिट रेटिंग में उसके आधारभूत तत्व नहीं दिखते हैं.
एसएंडपी/मूडीज के लिए ए+/ए1 के बीच रेटिंग वाले देशों के बीच कई मानदंडों में साफ अंतर हैं.
सॉवरेन रेटिंग के मानदंड पर प्रभाव के चलते रेटिंग काफी कम दी गई है.
क्रेडिट रेटिंग की विधि को अर्थव्यवस्थाओं के आधारभूत तत्वों का प्रदर्शन करते हुए ज्यादा पारदर्शी, कम पक्षपातपूर्ण और ज्यादा व्यवस्थित होना चाहिए.

असमानता और विकास : गतिरोध या सम्मेलन?

विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत में असमानता और सामाजिक-आर्थिक परिणामों के साथ ही आर्थिक विकास और सामाजिक-आर्थिक परिणामों के बीच संबंध अलग हैं.
विकसित अर्थव्यवस्थाओं के विपरीत भारत में असमानता और प्रति व्यक्ति आय (विकास) का सामाजिक-आर्थिक संकेतकों के साथ समान संबंध हैं.
असमानता की तुलना में गरीबी उन्मूलन पर आर्थिक विकास का ज्यादा प्रभाव होता है.
गरीबों को गरीबी से उबारने के लिए भारत को जोर आर्थिक विकास पर बना रहना चाहिए.

स्वास्थ्य पर हो मुख्य ध्यान!

कोविड-19 महामारी ने स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र के महत्व और उसके दूसरे क्षेत्रों के साथ अंतर-संबंधों को जाहिर किया है, जिससे पता चलता है कि कैसे एक स्वास्थ्य संकट आर्थिक और सामाजिक संकट में बदल सकता है.
भारत का हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर कुशल होनी चाहिए, जिससे महामारियों की स्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया दी जा सके.
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) ने गरीबों तक देखभाल की पहुंच के रूप में असमानता को दूर करने में अहम भूमिका निभाई है.
सार्वजनिक खर्च जीडीपी के 1 प्रतिशत से बढ़कर 2.5-3 प्रतिशत होने से स्वास्थ्य देखभाल पर लोगों द्वारा किए जाने वाला खर्च 65 प्रतिशत से घटकर 35 प्रतिशत होने का अनुमान है.
स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए एक नियामक के गठन पर विचार किया जाना चाहिए.

प्रक्रियागत सुधार

भारत में अर्थव्यवस्था के ज्यादा रेगुलेशन के चलते तुलनात्मक रूप से प्रक्रिया के साथ बेहतर अनुपालन के बावजूद नियमों का असर नहीं होता.
अत्यधिक रेगुलेशन की समस्या की मुख्य वजह वह दृष्टिकोण है, जो हर संभावित निष्कर्ष के लिए प्रयास करता है.
नियमों को सरल बनाया जाना चाहिए और निरीक्षण पर ज्यादा जोर दिया जाना चाहिए.
लेबर कोड से लेकर बीपीओ क्षेत्र में लागू अत्यधिक नियमों को हटाने तक कई सुधार लागू कर दिए गए हैं.

नियामकीय राहत एक उपचार है, कोई स्थायी उपाय नहीं

वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान, नियामक राहत सहायता से कर्ज लेने वालों को अस्थायी सुविधा मिली.
आर्थिक सुधार के बाद राहत सहायता लंबे समय तक जारी रही, जिससे अर्थव्यवस्था पर अवांछित नकारात्मक असर हुए.
बैंकों ने अपने बहीखातों को दुरुस्त करने के लिए इस राहत सुविधा का उपयोग किया और कर्ज का गलत आवंटन किया, जिससे अर्थव्यवस्था में निवेश की गुणवत्ता को नुकसान हुआ.
राहत सहायता एक तात्कालिक उपचार है, जिसे अर्थव्यवस्था के सुधार प्रदर्शित करने के पहले अवसर पर बंद कर देना चाहिए, न कि स्थायी खुराक के रूप में इसे सालों तक जारी रखना चाहिए.

इनोवेशन : बढ़ रहा है, लेकिन खासतौर से निजी क्षेत्र से अधिक समर्थन जरूरी

भारत ने ग्लोबस इनोवेशन इंडैक्‍स की 2007 में शुरूआत के बाद से 2020 में पहली बार शीर्ष-50 इनोवेशन देशों के क्‍लब में प्रवेश किया.
भारत की महत्‍वाकांक्षा होनी चाहिए कि वह इनोवेशन के मामले में शीर्ष 10 अर्थव्‍यवस्‍थाओं से प्रतिस्‍पर्धा करे.
इनोवेशन के लिए घोषित उच्‍च कर लाभों और इक्विटी पूंजी तक पहुंच के बावजूद यह स्थिति बनी हुई है.
भारत के व्‍यवसाय क्षेत्र को अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्र में निवेश में पर्याप्‍त वृद्धि करने की जरूरत है.
देश में किए जाने वाले कुल पेटेंट आवेदनों में भारतीयों की भागीदारी को मौजूदा 36 प्रतिशत से बढ़ाकर अधिक करना चाहिए, जबकि यह दस शीर्ष बड़ी अर्थव्‍यवस्‍थाओं के 62 प्रतिशत के औसत से बहुत कम है.

PM‘JAY’ की शुरूआत और स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी निष्‍कर्ष

प्रधानमंत्री जन आरोग्‍य योजना (PMJAY) – भारत सरकार द्वारा 2018 में शुरू की गई एक महत्‍वाकांक्षी योजना है, जिसका उद्देश्‍य सबसे कमजोर तबके के लोगों को स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल उपलब्‍ध कराना है. इस योजना ने बहुत कम समय में स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल के क्षेत्र में दृढ़ और सकारात्‍मक असर दिखाया है.
पीएमजेएवाई का इस्‍तेमाल डाय‍लिसिस जैसे बार-बार किए जाने वाले किफायती उपचार के लिए किया गया और यह कोविड महामारी और लॉकडाउन के दौरान भी जारी रहा.
इससे स्‍वास्‍थ्‍य बीमा कराने वाले परिवारों की संख्‍या बिहार, असम और सिक्किम में 2015-16 से 2019-20 तक 89 प्रतिशत रही, जबकि पश्चिम बंगाल में इसी अवधि में 12 प्रतिशत की गिरावट आई.
2015-16 से 2019-20 के दौरान शिशु मृत्‍यु दर गिरकर पश्चिम बंगाल में 20 प्रतिशत पर, जबकि तीन पड़ोसी राज्‍यों में 28 प्रतिशत पर आ गई.
जब हम PMJAY लागू करने वाले सभी राज्‍यों की तुलना उन राज्‍यों से करते हैं, जिन्‍होंने इसे लागू नहीं किया, तो हम पाते है कि सभी स्‍वास्‍थ्‍य उपाय समान रूप से प्रभावी हुए हैं.
कुल मिलाकर इस तुलना से यह निष्‍कर्ष निकलता है कि जिन राज्‍यों में पीएमजेएवाई लागू किया गया, उनमें विभिन्‍न स्‍वास्‍थ्‍य निष्‍कर्षों में महत्‍वपूर्ण सुधार आया.

बुनियादी जरूरतें

2012 के मुकाबले 2018 में देश के सभी राज्‍यों में बुनियादी आवश्‍यकताओं तक लोगों की पहुंच में पर्याप्‍त सुधार दर्ज किया गया है.
केरल, पंजाब, हरियाणा और गुजरात में यह सर्वोच्‍च स्‍तर पर पाया गया, जबकि ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में यह सबसे कम रहा.
पानी, आवास, स्‍वच्‍छता, सूक्ष्‍म-पर्यावरण और अन्‍य सुविधाओं जैसे पांच क्षेत्रों में काफी सुधार दिखाई दिया.
देश के सभी राज्‍यों के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में असमानता कम हुई है, क्‍योंकि 2012 से 2018 के दौरान पिछड़े राज्‍यों को काफी लाभ मिला है.
देश के सभी ग्रामीण और शहरी इलाकों के गरीब परिवारों की स्थिति में अमीर परिवारों की तुलना में काफी सुधार आया है.
देश के सभी राज्‍यों के ग्रामीण और शहरी इलाकों और अलग-अलग आय वर्गों की बुनियादी आवश्‍यकताओं पर पहुंच में अंतर कम करने पर ध्‍यान दिया जाना जरूरी है.
जल जीवन मिशन, एसबीएम-जी, पीएमएवाई-जी आदि जैसी योजनाएं इस अंतर को कम करने के लिए उपयुक्‍त रणनीति तैयार कर सकती हैं.

वित्‍तीय घटनाक्रम

भारत ने कोविड-19 महामारी के असर से अपनी अर्थव्‍यवस्‍था को उबारने के लिए एक विशिष्‍ट और उपयुक्‍त दृष्टिकोण अपनाया, जबकि बहुत से देशों ने इसके लिए बड़े-बड़े प्रोत्‍साहन पैकेज अपनाए थे.
2020-21 में हमारी व्‍यय नीति का प्रारम्भिक लक्ष्‍य कमजोर तबकों को सहयोग और समर्थन उपलब्‍ध कराना था, लेकिन लॉकडाउन खत्म होने के बाद इसमें बदलाव कर सकल मांग को बढ़ाने और पूंजीगत व्यय के अनुरूप बनाया गया.
जीएसटी की शुरूआत के बाद से लेकर पिछले तीन महीने में, मासिक जीएसटी संग्रह, एक लाख करोड़ के आंकड़े को पार कर गया है और दिसम्‍बर 2020 में यह उच्‍चतम स्‍तर पर पहुंच गया.

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बाहरी क्षेत्र

कोविड-19 महामारी के चलते वैश्विक व्‍यापार में तेज गिरावट आई, उपभोक्‍ता वस्‍तुओं के दाम कम हुए और बाहरी वित्‍तीय स्थितियों में संकुचन आया, जिसके कारण चालू खाता संतुलन और विभिन्‍न देशों की मुद्रा पर असर पड़ा.
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 8 जनवरी, 2021 को अब तक के सर्वोच्‍च 586.1 बिलियन अमरीकी डॉलर आंकड़े को छू गया. इसमें करीब 18 महीने में किया गया आयात भी शामिल है.
अप्रैल-अक्‍टूबर 2020 के दौरान 27.5 बिलियन अमरीकी डॉलर का कुल एफडीआई आया, जो वित्‍त वर्ष 2019-20 के पहले सात महीने की तुलना में 14.8 प्रतिशत अधिक है.
अप्रैल-दिसम्‍बर 2020 के दौरान 28.5 बिलियन अमरीकी डॉलर का कुल एफपीआई आया, जबकि पिछले साल की इसी अवधि में 12.3 बिलियन अमरीकी डॉलर था.
भारत का वस्‍तु व्‍यापार घाटा कम होकर अप्रैल-दिसम्‍बर 2020 में 57.5 बिलियन अमरीकी डॉलर रहा, जबकि पिछले वर्ष की इसी अवधि में यह 125.9 बिलियन अमरीकी डॉलर था.
वस्‍तुओं का निर्यात अप्रैल-दिसम्‍बर 2020 में 15.7 प्रतिशत घटकर 200.8 बिलियन अमरीकी डॉलर हो गया, जबकि यह अप्रैल-दिसम्‍बर 2019 में 238.3 बिलियन अमरीकी डॉलर था.
पेट्रोलियम, तेल और लुब्रिकेंट्स (पीओएल) निर्यात ने समीक्षाधीन अ‍वधि के दौरान हमारे निर्यात प्रदर्शन में नकारात्‍मक योगदान किया।

धन प्रबंधन और फाइनेंशियल इंटरमीडिएशन

2020 के दौरान सुविधाजनक मौद्रिक नीति : रेपो दर में 115 आधार अंकों की मार्च 2020 से कमी की गई.
वित्‍त वर्ष 2020-21 में जमा और उधारी की निचली नीतिगत दरों से मौद्रिक प्रचलन में सुधार आया.
20 जनवरी, 2021 में निफ्टी 50 ने अपने उच्‍चतम स्‍तर 14,644.7 अंक और BSE SENSEX 49,792.12 अंक के उच्‍चतम स्‍तर तक पहुंचा.
अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की आईबीसी के माध्‍यम से रिकवरी दर 45 प्रतिशत से ऊपर रही.

मूल्‍य और मुद्रास्‍फीति

उपभोक्‍ता मूल्‍य सूचकांक महंगाई दर अप्रैल से दिसंबर, 2020 के दौरान औसतन 6.6 प्रतिशत पर रही, मुख्‍य रूप से खाद्य महंगाई दर में वृद्धि के कारण दिसंबर, 2020 में 4.6 पर आ गई.
2020 में सीपीआई मुद्रा स्फीति में ग्रामीण-शहरी अंतर में कमी दर्ज की गई.
नवंबर 2019 में सीपीआई शहरी मुद्रा स्फीति ने सीपीआई ग्रामीण मुद्रा स्फीति के अंतर की भरपाई की है.
जून, 2020 से नवंबर, 2020 की अवधि में भोजन की थाली में शामिल वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी हुई. हालांकि, दिसंबर के महीने में इनकी कीमतों में आई तेज गिरावट कई आवश्यक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में गिरावट को दर्शाती है.
कोविड-19 के दौरान सोने में अधिक निवेश करने से इसकी कीमतों में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई और इससे आर्थिक अनिश्चिताएं सामने आई.
अन्य संपत्तियों के मुकाबले वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान सोने में निवेश से अधिक लाभ हुआ.

सतत विकास और जलवायु परिवर्तन

भारत ने सतत विकास के उद्देश्यों को नीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों में क्रियान्वित करने के लिए अनेक सक्रिय कदम उठाए हैं.
साल 2030 के एजेंडे में शामिल उद्देश्यों को हासिल करने के लिए किसी भी रणनीति में इन उद्देश्यों को स्थानीय स्तर पर लागू करना बहुत जरूरी है.
अनेक राज्यों/संघ शासित प्रदेशों ने सतत विकास के उद्देश्यों के क्रियान्वयन के लिए संस्थागत ढांचों का निर्माण किया है और इनमें बेहतर समन्वय एवं समायोजन के लिए जिला स्तर पर प्रत्येक विभाग में एक नोडल प्रक्रिया भी स्थापित की है.
जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीसीसी) के तहत 8 राष्ट्रीय मिशनों की स्थापना की गई और इनका मुख्य उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के संकंटों से निपटना है.
भारत की राष्ट्रीय प्रतिबद्धता योगदान (एनडीसी) का कहना है कि जलवायु परिवर्तन कार्य योजना के लिए वित्त की अहम भूमिका है।
इन उद्देश्यों को हासिल करने के लिए जिस प्रकार आवश्यक कदम उठाए गए है उनके लिए वित्तीय पहलू काफी महत्वपूर्ण होंगे.

कृषि और खाद्य प्रबंधन

भारत के कृषि (और सहायक कार्य) क्षेत्र में कोविड-19 के कारण हुए लॉकडाउन जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच लचीलापन देखने को मिला, जहां 2020-21 के दौरान 3.4 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिली.
देश के सकल मूल्‍य वर्धन (जीवीए) में कृषि और सहायक क्षेत्रों की हिस्‍सेदारी वर्ष 2019-20 के लिए 17.8 प्रतिशत रही.
फरवरी, 2020 की बजट घोषणा के बाद प्रधानमंत्री के आत्‍मनिर्भर भारत पैकेज के तहत किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) प्रदान करने के लिए दुग्‍ध सहाकारिता और दुग्‍ध उत्‍पादन कंपनियों के 1.5 करोड़ डेयरी किसानों को लक्षित किया गया.
जनवरी, 2021 के मध्‍य तक मछुआरों और मत्‍स्‍य पालकों को 44,673 किसान क्रेडिट कार्ड जारी किये गये.
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में वर्ष-दर-वर्ष 5.5 करोड़ किसानों के आवेदनों को शामिल किया गया है.
आधार को जोड़कर किसानों के खातों में तेजी से सीधे दावों का निपटारा किया गया।
70 लाख किसानों को लाभ मिला और कोविड-19 लॉकडाउन अवधि के दौरान 8741.30 करोड़ रुपये का ट्रांसफर किया गया.

उद्योग और बुनियादी ढांचा

आईआईपी आंकड़ों द्वारा एक मजबूत तेजी से उभरती आर्थिक गतिविधियों की पुष्टि की गई है.
आईआईपी में विस्‍तृत आधार वाले सुधार के परिणामस्‍वरूप नवम्‍बर, 2020 में (-) 1.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो नवम्‍बर, 2019 में 2.1 प्रतिशत और अप्रैल, 2020 में (-) 57.3 प्रतिशत रही.
टीकाकरण अभियान और सुधार उपायों को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता के साथ सरकार द्वारा पूंजीगत व्‍यय बढ़ाने के साथ औद्योगिक गतिविधियों में सुधार और मजबूती देखने को मिली.
भारत के जीडीपी का 15 प्रतिशत प्रोत्‍साहन पैकेज के साथ आत्‍मनिर्भर भारत अभियान का एलान किया गया.
वर्ष 2019 के लिए ईज ऑफ डूइंग बिजनेस सूचकांक में भारत का रैंक ऊपर उठकर 2020 में 63वें स्‍थान पर आ गया, जो 2018 में डूइंग बिजनेस रिपोर्ट के अनुसार 77वें स्‍थान पर था.
भारत ने 10 संकेतकों में से 7 में अपनी स्थिति में सुधार किया.
रिपोर्ट के अनुसार भारत को शीर्ष 10 सुधारकों में से एक के रूप में स्‍वीकृति मिली, 3 वर्षों में 67वें रैंक में सुधार के साथ ऐसा तीसरी बार हुआ है.

सेवा क्षेत्र

भारत का सेवा क्षेत्र कोविड-19 महामारी के बाद लागू लॉकडाउन के दौरान एच1: वित्‍त वर्ष 2020-21 के दौरान करीब 16 प्रतिशत रहा.
प्रमुख संकेतकों जैसे सेवा खरीद प्रबंधक सूचकांक, रेल माल यातायात और बंदरगाह यातायात सभी में लॉकडाउन के दौरान भारी गिरावट के बाद तेजी देखने को मिली.
सेवा क्षेत्र कुल निर्यात का 48 प्रतिशत है, हाल के वर्षों में वस्‍तुओं के निर्यात से अधिक है.
बंदरगाहों में जहाजों के आगमन और उनके रवाना होने का समय 2010-11 में 4.67 दिन था जो 2019-20 में घटकर 2.62 दिन हो गया.
कोविड-19 महामारी के बीच भारतीय स्‍टार्ट अप इकोसिस्‍टम अच्‍छी प्रगति कर रहा है, 38 स्‍टार्ट अप के साथ पिछले वर्ष इस सूची में 12 स्‍टार्ट अप जुड़े हैं.

सामाजिक बुनियादी ढांचा, रोजगार और मानव विकास

जीडीपी के प्रतिशत के रूप में सामाजिक क्षेत्र का मिला-जुला (केन्‍द्र और राज्‍यों) का खर्च पिछले वर्ष की तुलना में 2020-21 में बढ़ा.
भारत का प्रति व्‍यक्ति जीएनआई (2017 पीपीपी डॉलर) 2018 के 6,427 अमरीकी डॉलर के मुकाबले 2019 में बढ़कर 6,681 अमरीकी डॉलर हो गया.
महामारी के दौरान ऑनलाइन अध्‍ययन और रिमोट वर्किंग के कारण डेटा नेटवर्क, इलेक्‍ट्रॉनिक उपकरणों जैसे कम्‍प्‍यूटर, लैपटॉप, स्‍मार्ट फोन आदि तक पहुंच का महत्‍व बढ़ गया.
प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत महिला लाभार्थियों के बैंक खातों में तीन महीने तक 500 रुपये की राशि का सीधे हस्‍तांतरण किया गया, जिसके लिए कुल 20.64 करोड़ रुपये की धनराशि खर्च की गई.
3 महीने तक करीब 8 करोड़ परिवारों को मुफ्त गैस सिलेंडर वितरित किये गये.

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